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प्राचीन महाकूट मंदिर (6ठी/7वीं शताब्दी सीई)
मंदिरों का महाकूट समूह भारत के कर्नाटक राज्य के बागलकोट जिले के एक गांव महाकूट में स्थित है। यह हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण पूजा स्थल और एक प्रसिद्ध शैव मठ का स्थान है। मंदिर 6ठी या 7वीं शताब्दी के हैं और बादामी के चालुक्य वंश के शुरुआती राजाओं द्वारा बनाए गए थे।
कर्नाटक के महाकूट मंदिर को दक्षिण की काशी भी कहा जाता है। यहां शिव का प्रसिद्ध मंदिर है। महाकूट का शिव देवालय अपने सुंदर शिल्प के लिए प्रसिद्ध है। नागर शैली में बना यह मंदिर अपनी अष्टभुजाकृति व सुंदर गुंबद के लिए भी प्रसिद्ध है।
महाकूट बादामी के पास का एक छोटा सा गांव है, जो सुरम्य पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार अगस्त्य मुनि ने दो असुर भाइयों वातापि और इल्वाल का यहीं पर संहार किया था। कहा जाता है कि मृत्योपरांत दोनों असुर दो पहाड़ बन गए।
मंदिर में प्रवेश के लिए एक विशाल द्वार का निर्माण किया गया है। देवालय के अंदर अर्ध मंडप, मुख मंडप और गर्भगृह बना हुआ है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों तरफ द्वारपाल की मूर्तियां बनी हैं। मंदिर परिसर में कई और मूर्तियां दिखाई देती हैं। यहां साल भर नियमित उपासना होती है और हर रोज यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
महाकूट मंदिर समूह का निर्माण बादामी चालुक्य राजाओं द्वारा छठी-सातवीं सदी में कराया गया था। मंदिर परिसर में एक विशाल सरोवर भी है। इसका नाम विष्णु पुष्करिणी है। इस सरोवर में पहाड़ों से निर्मल जल सालों भर आता रहता है। कई लोग स्नान के बाद मंदिर में पूजन के लिए जाते हैं। दोपहर की गर्मी के बीच काफी लोग मंदिर के इस सरोवर के शीतल जल में स्नान करते दिखाई देते हैं।
मंदिर परिसर में एक कुआं भी है, जिसे लोग पापविनाशन तीर्थ कहते हैं। विष्णु पुष्करिणी के पास ही एक अनूठा शिवलिंगम है, जिसमें पांच अलग आकृतियां बनी हुई हैं। इसे पंचलिंगम कहते हैं।
पत्र से भेजा जाता है आशीष: महाकूटा मंदिर में एक अनूठी परंपरा नजर आती है। मंदिर के कार्यालय में हजारों की संख्या में पत्र लिखे हुए दिखाई देंगेे। इन पत्रों पर कर्नाटक के अलग-अलग जिलों के श्रद्धालुओं के पते लिखे होते हैं।
दरअसल ये सभी पत्र मंदिर में दान करने वाले श्रद्धालुओं के परिवार को साल भर भेजे जाते हैं। इन पत्रों से श्रद्धालुओं के लिए महाकूटेश्वर महादेव का आशीर्वाद भेजा जाता है।
महाकूट शिलालेख : यहां एक शिलालेख भी है। यह 595 से 602 ई. के बीच का है। इस स्तंभ पर संस्कृत और कन्नड़ में लिखा गया है। इस शिलालेख में चालुक्य राजा पुलकेशिन प्रथम की पत्नी दुर्लभदेवी द्वारा दान दिए जाने का उल्लेेख है। इसमें पट्टडकल, एहोल समेत दस गांवों को दान दिए जाने का उल्लेख है। यह शिलालेख अब बीजापुर संग्रहालय में देखा जा सकता है।
यहां एक और शिलालेख है, जो वीनापोति द्वारा लिखवाया गया है। यह चालुक्य राजा विजयादित्य की एक रानी थीं। कन्नड़ में लिखा यह शिलालेख 693-733 ईसवी के बीच का है। इस शिलालेख में रानी द्वारा महाकूट मंदिर को दान दिए जाने का उल्लेख है।
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